उदास मनों में झांकता फेसबुक

भारत में छह करोड़ लोग इंटरनेट के आभासी जगत की नागरिकता ले चुके हैं। आभासी और असली जगत के अंतर और अंतर्विरोध को जीने लगे हैं। आपसी रिश्तों के समीकरण बदल चुके हैं। रिश्तेदारी का मतलब नेटवर्किंग हो गया है। एक क्लिक से कोई आपका दोस्त हो जाता है और कोई दोस्ती के लायक नहीं समझा जाता। ऑरकुट से लेकर फेसबुक तक। लाखों लोग रोज़ कुछ न कुछ लिख रहे हैं। सबको तलाश है एक काल्पनिक रिश्ते की। यही तलाश हमारे भीतर रिश्तों की कमी को बड़ा करती है। हम सर्च करते हैं। खोजते हैं कि कोई अपने जैसा, अपनी तरह के गीत संगीत सुनने वाला, किताब पढ़ने वाला है जो दोस्त बन सकता है। कोई स्कूल के नाम पर मिल जाता है तो कोई बैच के नाम पर। हर दिन फेसबुक पर आग्रह मिलता है कि या तो मुझे दोस्त के रूप में स्वीकार कर लीजिए या फिर इग्नोर या नज़रअंदाज़ कर दीजिए। नज़रअंदाज़ बटन पर क्लिक करते समय एक बार मन कांपता है। इसने ऐसा क्या किया है जिसे अस्वीकार कर रहा हूं। कहीं बुरा तो नहीं मानेगा। मानेगा तो क्या कर लेगा। किस- किस का आग्रह कंफर्म यानी स्वीकार करूं। ऐसी मानसिक अवस्था से गुज़रते हुए फेसबुक पर नेट- नागरिक अपनी रिश्तेदारी को आगे बढ़ाते रहते हैं।


फेसबुक में लोग क्यों आते हैं। मूल कारण क्या होता है इसका ठोस जवाब नहीं है। लेकिन लगता है कि लोग एक दूसरे की मन की बातों को जानने के लिए आते हैं। स्टेटस अपडेट में आप चंद वाक्य लिख सकते हैं। मन की बात। कोई रात को नहीं सोया तो लिख दिया कि करवटें बदलते रहें सारी रात हम। मन की बात पर कमेंट भी आते हैं। कोई लिखेगा क्यों क्या हुआ? दफ्तर की वजह से या गर्लफ्रैंड की वजह से। तो क्या हम मन की बात अपनों से,उनके सामने नहीं कह सकते? तभी तो हम आभासी जगत के रिश्तेदारों के बीच उगलते हैं। कोई वीकेंड मनाने का उत्साह ज़ाहिर करता है। काल्पनिक वीकेंड। मस्ती, बीयर और किताबें। ऐसा होता नहीं। वीकेंड कपड़े धोने से शुरू होता है और कब फालतू चीज़े करता हुआ खतम हो जाता है, पता नहीं चलता है। लेकिन वीकेंड को लेकर अंग्रेजी साहित्य और सिनेमा से आया रोमांस अब आम भारतीय जीवन का सपना है। आम से मतलब नेट-नागरिकों से है।

स्टेटस कॉलम में लिखे जानी वाली मन की बातों का समाजशास्त्रीय अध्ययन होना चाहिए। कोई ग़ालिब की शायरी ले आता है तो कोई आर डी बर्मन के गीतों का ज़िक्र कर जाता है।कोई लड़की लिख जाती है कि उसे तलाश है एक अच्छे लड़के की। कोई अपने परिवार का फोटा साझा करता है। स्टेटस अपडेट में आप लिखेंगे तो आपस जुड़े सभी दोस्त पढ़ सकते हैं। जान जाते हैं कि आपके मन के भीतर क्या चल रहा है। लेकिन क्या वो असली होता है। हर बार मौलिक नहीं होता है। कई बार मन की बात लिखने के लिए लोग ज़बरन कुछ लिखते हैं। कोई सहानुभूति बटोरना चाहता है तो कोई बेटी के पास होने की खुशी बांटना चाहता है। लड़कियां जब स्टेटस में लिखती हैं तो उनकी बातों की प्रतिक्रिया में तस्वीरों की खूबसूरती की चर्चा होती है।कई लड़कियां अब परेशान होने लगी हैं। वो अब ज़्यादा और अनजान दोस्त बनाने के खतरे के कारण दूर हो रही हैं। लड़कियों के फेसबुक दोस्तों की संख्या सीमित होती है। लड़के उदार होते हैं। वही जो हम अपने आम जीवन में होते हैं, फेसबुक में दिखता है।


आम जीवन में भी तो हम आभासी ही होते हैं। मन की बात बच-बचाकर कहते हैं। लेकिन ऐसा क्या है कि हम सामने जो कह सकते हैं,उसी बात को फेसबुक में जाकर कहते है। क्या यह गैर-इरादतन रिश्तेदारी है? एक दिन दफ्तर के बाहर कुछ लोग मिले। कहा कि हम लोग दोस्त हैं। मैं हैरान हो गया। पूछा कि दोस्त तो उन्होंने कहा कि जी हम लोग फेसबुक पर दोस्त हैं। बहुत अच्छा लगा। हम कहीं पर दोस्त हैं। हम किसी के दोस्त नहीं हैं। हम सब बदल रहे हैं। अब एकांत का मतलब खतम हो गया है। फेसबुक ऑन कीजिए तो एक चैट वाला पॉप अप हो जाता है। कोई लिख देता है- जगे हैं? बस बात शुरू हो जाती है। मौन रहते हुए,बिना आवाज़ निकाले,बातें होने लगती हैं।

NDTV का नया वेबपेज

social.ndtv.com क्लिक कीजिए। आपको कई चेहरे और नाम मिलेंगे जिनके साथ आप उनके कार्यक्रमों के बारे में बात कर सकते हैं। बस आपको करना है-social.ndtv.com/ravishkumar । अगर मेरा नाम जोड़ कर क्लिक करेंगे तो मेरा पेज खुल जायेगा। इसी तरह आप कई लोगों के नाम के साथ पेज ओपन कर सकते हैं। ये फेसबुक की तरह है। लेकिन अगर मैं यहां अपडेट करूंगा तो एक साथ फेसबुक और ट्वीटर पर भी अपडेट हो जाएगा। अलग से फेसबुक पर अपडेट करने की ज़रूरत नहीं है। इस पेज पर ब्लॉग करने की भी सुविधा है जिसमें पांच हज़ार कैरेक्टर आ जाते हैं। सोशल पेज पर अपडेट के लिए १४० कैरेक्टर की सुविधा है। यहां आप किसी भी क्रायक्रम के बारे में जाकर अपनी राय दे सकते हैं। जब से फेसबुक का खाता बंद हो गया है,मैंने अपनी नेटवर्किंग की दुकान वहीं खोल ली है। मन का रेडियो वहीं बजाता हूं। नेट-नागरिक बिना नेटवर्किंग के नहीं रह सकते। लिखित वार्तालाप आधुनिक क्रिया है। कंप्यूटर आया तो लोगों ने कहा कि लिखना खतम हो जाएगा। उल्टा हो रहा है। बोलना खतम होने जैसा लगता है। मन की बात कहने के लिए लोग लिख रहे हैं। बोल नहीं रहे हैं। जब तक फेसबुक का खाता वापस नहीं होता,सोशल पेज पर ही मिलूंगा।

हिंदी-अंग्रेजी के अख़बारों का किसान अलग क्यों होता है

अमर उजाला ने क्यों लिखा कि किसानों ने झुका दी सरकार और हिंदुस्तान टाइम्स का हेडर क्यों ऐसा था- BITTER HARVEST,THEY PROTESTED,DRANK,VANDALISED AND PEED.हिंदुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया ने किसानों के आंदोलन को ऐसे देखा और लिखा जैसे हुणों का हमला हो गया हो। दिल्ली लुट गई है। चार तस्वीरें निकाल कर लगा दी गईं। शराब पीते हुए। सरिया निकालते हुए और पथ-निर्देशिका गिराते हुए।


हिंदी और अंग्रेजी के अखबारों ने किसानों के आंदोलन को अलग अलग चश्में से देखा। क्या अमर उजाला लिख सकता था कि किसानों ने दिल्ली बर्बाद कर दी। ट्रैफिक जाम लगा दिया। क्यों इस अखबार ने लघु-हेडर लगाए कि गन्ना मूल्य नीति के विरोध में किसानों का ज़ोरदार प्रदर्शन। क्या अगर अमर उजाला हिंदुस्तान टाइम्स की तरह लिखता तो उसके पाठक स्वीकार करते। भले ही पश्चिम उत्तर प्रदेश के शहरों से निकलता हो लेकिन आज भी इन शहरों के लोग गांवों से जुड़े हैं। थोड़े किसान हैं या किसी किसान को जानते होंगे। हिंदुस्तान टाइम्स का पाठक बिल्कुल अलग। तो क्या पाठकों की संवेदनशीलता और वर्ग चरित्र के अनुसार एक ही घटना को दो चश्मे से देखेंगे। वैसे मैं हैरान क्यों हूं?


नहीं मैं हैरान नहीं हूं। डरा हुआ है। शुक्रवार की सुबह जब अंग्रेजी अखबार देखा तो लगा कि दिल्ली में इतना बड़ा हमला हुआ और पता ही नहीं चला। सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस ने किसानों के आंदोलन को विकृति नहीं बताया। दिल्ली में आए दिन टायर पंचर होने से जाम लगते रहते हैं। यह भी सही है कि जाम के कारण कई लोगों को भयानक परेशानी होती है। तो बहस यही कर लेते कि आंदोलन होने चाहिए या नहीं। इस पर भी कर लेते कि अगर सरकार पहले ही सुन लेती तो दिल्ली एक दिन के लिए परेशान न होती। महीनों से पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसानों के आंदोलन चल रहे हैं। अजीब बात ये है कि इसी हिंदुस्तान टाइम्स में गन्ना किसानों की लागत और समस्या पर काफी विस्तार से एक अच्छी रिपोर्ट छपी थी। काफी मेहनत से लिखी गई थी वो रिपोर्ट। लेकिन जब किसान दिल्ली आए तो ट्रैफिक और सिविक सेंस इतना हावी हो गया कि वो हमारे लिए किसी और ग्रह से आए एलियन बन गए।
जिस शहर के बारे में चिदंबरम तक कह चुके हैं कि गाड़ी चलाने की तमीज़ नहीं। सड़क पर पिशाब करते चलते हैं। जगह जगह गदहा से लेकर कुत्ते का बाप मूत रहा है टाइप के बोर्ड लगें हों उस शहर को अपनी सफाई पर इतना नाज़। वाह। ठीक किया कि किसान गन्ना भी साथ ले आए। वर्ना किसी को पता ही नहीं चलता कि सुगरकेन होना क्या है।

इसमें कोई शक नहीं कि महानगरों का अब गांव-कस्बों से रिश्ता टूट गया है। गांव से जो आ रहे हैं वो अब खांटी ग्रामीण नहीं है। एक साल में पांच शहर जाते हैं मज़दूरी करने। दो महीने गांव रहते हैं और दस महीने भटकते रहते हैं। उनके ग्रामीण संस्कार खतम हो चुके हैं। गांवों में भी पारंपरिक ज्ञान भंडार खतम होने का एक कारण यह भी है। लेकिन शहर यह भी भूल गया कि इनकी कुछ समस्या होगी। फेसबुक पर कम्युनिटी बनाकर आंदोलन का शौक पाल रही दिल्ली को अब जंतर मंतर पर किसी और का जाना भी गवारा नहीं हो रहा है।

ये रिश्ता किसानों की तरफ से भी टूटा है। उनके लिए दिल्ली अब एलियन हो गई है। इसीलिए कुछ किसानों ने तोड़फोड़ की। जंतर मंतर में पिशाब किया। जो नहीं करना चाहिए था। लेकिन वो दिल्ली पर उससे अनजानेपन की खीझ निकाल रहे थे। एक तरह का गुस्सा कि उनके सस्ते माल की कमाई पर शहर का ये नखरा। अंग्रेजी के अखबारों के लिए किसान अब किरदार नहीं रहे। वो खलनायक हैं जो बात बात में मांग कर शहर के लोगों को महंगाई के मुंह में झोंक देते हैं। फिर अमर उजाला ने ऐसा क्यों नहीं लिखा।

२० नवंबर के दिन दिल्ली में आए किसानों और प्रेस में हुई रिपोर्टिंग को लेकर अध्ययन होना चाहिए। न्यूज चैनलों की बात नहीं कर रहा हूं। उनकी बात करना बेकार है। मीडिया की वफादारी मुद्दे को लेकर नहीं है, अपने पाठक के वर्ग चरित्र को लेकर है। इसीलिए अमर उजाला लिखता है कि किसानों ने झुका दी सरकार। अंग्रेजी के अखबार लिखते हैं कि वे आए, हमला किया और मूत कर चले गए। न्यूज़ रूम का वर्ग चरित्र भी तो बदला है। जिस वर्ग के प्रति निष्ठा पत्रकारों को दिखानी पड़ रही है(मजबूरी में)उसी वर्ग के वे शिकार भी हो रहे हैं। आम आदमी की रिपोर्टिंग पर चार पांच बड़े अवार्ड बंद कर दिये जाएं तो सिंगल खबर न छपेगी न कोई टीवी का रिपोर्टर एक बाइट भी लेने जाएगा।

जानलेवा सड़कें- बेदिल शहर

सड़क दुर्घटनाओं को लेकर हम कब गंभीर होंगे। हर दिन सवा तीन सौ लोगों की मौत हो जाती है। एक मौत होती है तो बीस घायल होते हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ रोड एंड ट्रैफिक एजुकेशन के इस आंकड़े पर कई बार रिपोर्टिंग हो चुकी है। मैंने भी कई बार की है। लेकिन इन आंकड़ों की प्रसारण बारंबरता बढ़ाने के बाद भी फर्क नहीं पड़ता। आज सुबह फिर खबई आई कि नोएडा में नौवीं क्लास के बच्चे को बस ने कुचल दिया। भारत के अराजक समाज को कहां कहां से संवेदनशील किया जाए। शहर अभी भी हमारी मानसिकता में एक बिगड़ा हुआ जगह है। शुरू के पचास साठ साल तक भारत में गांवों को लेकर जो धमाल पैदा किया गया उससे शहरों के प्रति नकारात्मक सोच पैदा हुई। हमारे गांव में लोग ऐसे बात करते थे जैसे हर शुद्ध चीज़ यहीं पैदा होती थी। होती थी लेकिन यह एक छद्म गर्व भाव था। शहर से आने वाले लड़के लड़कियों का मज़ाक उड़ाया जाता था। शहर हमारी सोच में बैरी संस्कृति की तरह रहा है। इसलिए हमारी कोई नागरिक मानसिकता नहीं बन पाई। हम शहर से बगावत करते रहते हैं। शहर से नफरत करते हैं।

लेकिन शहर फैल रहे हैं। शहरी आबादी बढ़ रही है। शहर अब वाकई अराजक होते जा रहे हैं। सुविधाओं के लिहाज़ से और यहां बसने वाले लोगों की सोच में शहरों के प्रति धंसी अराजक मानसिकता से। दोनों मिलकर शहर को दुर्घटना स्थल बना रहे हैं। एक गंदी जगह लगती है। बीस साल लोग सड़क दुर्घटनाओं से अपंग हो चुके हैं। सवा लाख लोग हर साल मारे जाते हैं। पंद्रह लाख लोगों के खिलाफ चालान कटता है। ज़ाहिर है हम सड़क के साथ उदंडता का बर्ताव करते हैं।

हर सुबह पढ़े लिखे मां बाप सोसायटियों के गेट पर बच्चों के साथ खड़े रहते हैं। बेतरतीब। एक साथ कई स्कूल की बस आ जाती है। उनके बीच से निकलते-भागते रहते हैं। सड़क पर गाड़ियां रफ्तार से दौड़ रही होती हैं। सरकारी स्कूल के बच्चों का तो और बुरा हाल है। सरकारी स्कूलों के गेट के बाहर भगदड़ मची रहती है। बेनियंत्रित ट्रैफिक के हम सब शिकार हैं। ट्रैफिक को बेलगाम बनाने में हमारा ही योगदान है। मगर सोचिये कि हम सब जान लेने की हद तक चले जाते हैं। पी के कार चलाने से लेकर एफएम सुनते हुए बेहोश होकर कार चलाने तक। शहरी संस्कार गढ़ने की ज़रूरत है। शहर को अपनाने की ज़रूरत है। कस्बे का रोमांस अच्छा है लेकिन यहां दिल लग जाए तो क्या बुरा है। वर्ना कब तक कविताओं और शायरी में शहरों को बेदिल बताते रहेंगे। रहते या रहना चाहते तो यहीं हैं न।

क्या जेल फ्लाप हो सकती है?

सड़े हुए सिस्टम से सारी उम्मीद हार जाएं और अंत में उसी सिस्टम से कोई उम्मीद निकल आए तो अच्छा लगता है। जेल देखते हुए भी यही लगा। धीमी परंतु अच्छी फिल्म है। धीमी इसलिए कि निर्देशक चाहता होगा कि आप धीरज रखें और किरदारों की व्यथा को समझें। उतना ही धीरज रखें जितना ये लोग न्याय की आस में अन्याय से जूझते हुए अपनी बेबसी को धीरज का दिलासा देते हैं। मधुर भंडारकर ने जेल के भीतर के यथार्थ को अपनी कूव्वत के अनुसार खींचने की कोशिश की है। मधुर का नायक पराग आज कल का लड़का है। जिसके पास अभिव्यक्ति नहीं है। वो खुद को कामयाबी के पलो, डिस्कों रातें और प्रेमिका की बाहों में आते हुए ही अभिव्यक्त कर पाता है। पराग दीक्षित के पास बड़े बड़े संवाद नहीं हैं। संवाद मनोज वाजपेयी के पास हैं। वो भी प्रकारांतर से आते हुए। होठ नहीं हिलते हैं। मनोज अपने चेहरे और आंखों से संवाद बोलते हैं और प्रकारांतर से संवाद आता है। ये पराग पर मेरे भरोसे की जीत थी। इस एक लाइन ने फिल्म के अंत में गुदगुदा दिया। इससे पहले तक का यथार्थ डरा रहा था,बेचैन कर रहा था और बीच सिनेमा से जाने को कह रहा था। बाहर नहीं गया और देखता चला गया।


हिंदुस्तान की जेलों की हालत बेहद अमानवीय है। इस पहलू को सामने लाने का काम पत्रकारों का था लेकिन मधुर भंडारकर ने प्रभावशाली तरीके से पूरा कर दिया। फिल्म की आखिर में लिख भी दिया कि इतने लोग अभी भी ट्रायल का इंतज़ार कर रहे हैं और बेकसूर हैं। पत्रकारों ने इस मुद्दे को आंकड़ों से तो उठाया लेकिन अपनी कथा को प्रभावशाली बनाने के लिए मानवीय पक्ष भूल गए। पत्रकारों के इस अधूरे काम को मधुर ने पूरा कर दिया। शुरू में मनोज का अभिनय कम लगा लेकिन आखिर की तरफ पहुंचते पहुंचते लगा कि मनोज वाजपेयी का किरदार कितना अहम था। एक ऐसा किरदार जो जेल के भीतर उम्मीदों को जगाने की कोशिश कर रहा था। एक ऐसे समय के रूप में खड़ा मिलता था जो देख रहा है कि यहां ऐसा ही होता है लेकिन जान रहा है कि कभी-कभी ऐसा नहीं भी होता है। जेल के भीतर की गंदगी, भीड़, बरसात में मुंबई की सड़कों से उठकर जेल के भीतर आ जाना। हर तरह की कहानियां। सबीना का किसी पुलिस अफसर का हो जाना और अपने पति को छोड़ देना। उसका पति खुद को खतम कर लेता है। सस्ती शायरी के ज़रिये आम लोगों की व्यथा को वृहत्तर कथा में बदलने वाला एक शायर का किरदार। मधुर ने खूब इस्तमाल किया है सड़क छाप सस्ते शेरों का। ग़ालिब का किरदार। जेल के भीतर रिश्ते बनते हैं, उनका इस्तमाल होता है और दगा भी दिया जाता है।

सुना है फिल्म नहीं चल रही। अब चलने के यथार्थ से जूझते हुए हम पत्रकार भी अचल होते जा रहे हैं। जेल की कहानी का यथार्थ मल्टीप्लेक्स के यथार्थ से दूर है। ये और बात है कि किरदार मल्टीप्लेक्स वाला ही है। ये फिल्म एकल सिनेमा में खूब चलेगी। आम लोगों का अनुभव जेल के करीब है। तारीख पर तारीख जैसे नाटकीय संवादों के बिना संवेदनशील होने का प्रयास करती है ये फिल्म। वकील लूट लेता है। जेल के भीतर अलग अलग लोगों के लिए अलग अलग न्याय व्यवस्था है। जेलर की भूमिका भी अच्छी निभाई गई है। सब सिस्टम में फंस गए हैं। यह फिल्म बता रही है कि हमने जो आधुनिक सिस्टम बनाई है वो सड़ चुकी है। इस सिस्टम में अब बचा कुछ नहीं है। दारोगा से लेकर दादा तक सबकी चल रही है। लेकिन मधुर इसी सिस्टम में आस्था व्यक्त कर रहे हैं। अच्छा है। नाटकीय ख्वाब दिखाने से तो अच्छा है कि जो है उसी के साथ जीने का धीरज सीख लिया जाए। जेल चले या न चले लेकिन मधुर भंडारकर को अफसोस नहीं होना चाहिए। फिल्म और प्रभावशाली बन सकती थी। उसके यथार्थ और असहनीय हो सकते थे। जो भी हो सकता था वो कम होता उन लाखों लोगों की पीड़ा को व्यक्त करने के लिए जो अपराध की सजा काटने के लिए अपराधी बन कर जीने को विवश है। जेल की जो नैतिक पहचान है वो यही कि यहां सजा का प्रायश्चित होता है। अपराधी इंसान बनता है। उस नैतिकता को बालीवुडीय अंदाज़ से अलग हट कर चोट पहुंचाने की कोशिश है। फिल्म का कैमरा वर्क काफी अच्छा है। लता का गाया भजन दाता सुन ले कहानी के संदर्भ में परेशान करता है। शांति कम बेचैन ज़्यादा करता है। अच्छा भजन है। फिल्म अच्छी है।

सुधीश पचौरी न रवीश कुमार

बहुत दिनों से जो बात कहना चाह रहा था उसे किसी युवा पत्रकार ने कह दिया। साफ-साफ कह दिया कि हम किससे प्रेरणा लें। हिंदी में कोई नहीं है। न रवीश कुमार से प्रेरणा ले सकते हैं न सुधीश पचौरी से। मेरी तो अभी सीखने की उम्र भी खतम नहीं हुई है और जो काम किया है वो निहायत ही शुरूआती है तो प्रेरणा क्या दूंगा। खैर ये सफाई नहीं हैं। सहमति है। यही बात जब मैंने एनडीटीवी के मीडिया स्कूल में कही थी तो लगा था कि कुछ ज़्यादा बोल गया। अब कह सकता हूं कि कई लोग ऐसा ही सोचते हैं। एनडीटीवी के मीडिया स्कूल में नए छात्रों से मैं कहने लगा कि हिदी टीवी पत्रकारिता में ऐसा कोई भी नहीं है,जिसकी तरह आप बनें। हम सब औसत लोग हैं। औसत काम करते हुए बीच-बीच में लक बाइ चांस थ्योरी से कभी-कभार अच्छा भी कर जाते हैं। लेकिन हम सब टीवी के लिहाज़ से मुकम्मल पेशेवर नहीं हैं। मैं छात्रों से गुज़ारिश कर रहा था कि मेरी बात याद रखियेगा। किसी से न तो प्रभावित होने की ज़रूरत है न प्रेरित। आप अपना रास्ता खुद तय करें और तराशें। लौट कर आया तो लगा कि कहीं ये संदेश न चला गया हो कि बंदा निराश हताश टाइप का है। लेकिन जब एक लड़के ने खम ठोक कर यह बात कह दी तो लगा कि वाह। मूल बात तो यही है।

दूरदर्शन के कार्यक्रम 'चर्चा में' की रिकार्डिंग चल रही थी। प्रभाष जोशी को याद किया जा रहा था। आईएमसी और अन्य पत्रकारिता संस्थान के छात्र थे। काफी जोश और ज़िम्मेदारी से बोले। उनकी बातों से हमारे पेशे में आए खालीपन को महसूस किया जा सकता था। वो अच्छा पत्रकार बनने के लिए बेचैन नज़र आए लेकिन वो सब वैसा ही क्यों बनना चाहते हैं जो पहले हो चुका है। वो किसी की तरफ देखते ही क्यों हैं। अगर यह नई पीढ़ी अपने जोश को बचा ले गई और मेहनत से काम को तराशती रही तो अच्छा कर जाएगी। दफ्तरी आशा-निराशा के चक्कर में फंस गई,छुट्टी लेने के लिए दादी-नानी को बीमार करती रही,वो नहीं करता तो मैं क्यों करूं टाइप की अकड़ पालती रही तो वही होगा जो हमारी पीढ़ी का हुआ। और ऐसा भी नहीं है कि हमारी पीढ़ी में लोगों ने साहसिक काम नहीं किये। बेहतर टीवी रिपोर्ट नहीं बनाई। बनाई। लेकिन जो हो रहा है उससे सबके किये कराये पर पानी फिर चुका है। बहरहाल नवोदित पत्रकारों की चिंताओं से लगा कि आज भी हिंदी का पत्रकार इसीलिए पत्रकार बनना चाहता है कि वो समाज में बदलाव चाहता है। गरीबों की आवाज़ उठाना चाहता है। कितनी बड़ी बात है। फिर ऐसा क्या हो जाता है कि नौकरी पाने के बाद कोई इस जुनून को साधता हुआ नज़र नहीं आता। यही प्रार्थना है कि इनका जुनून बचा रहे। यह कार्यक्रम शनिवार को आएगा। विद्रोही बुलंद पत्रकार को साधुवाद।

निर्देशों का शहर




दिल्ली के सरायकाले खां से जब आप आश्रम की तरफ जा रहे होते हैं तो डीएनडी आने से पहले बाईं तरफ़ ये होर्डिंग मिलेगी। बहुत दिनों से दिख रही थी। इसे देखकर मैं परेशान हो रहा था। इस तरह के निर्देश कैसे हो सकते हैं। पता चला कि वहां कोई मंदिर है जो कुछ बीमारियों को दूर करने का दावा करता है। लगता है कि यह बोर्ड अधूरा है। फिर भी अगर यह न मालूम हो कि यहां कोई औघड़ बाबा बैठे हैं तो अजीब लगता है। नींद में पेशाब करना। मत करना।

हम क्वालिटी बेचते हैं











एक अर्से से दरियागंज जा रहा हूं। प्रिंस पान की दुकान देखता रहा हूं। लेकिन पंद्रह साल बाद आज सड़क पार कर गया। तस्वीरें ली और प्रिंस पान वाले से बात की। दुकान की सजावट देख कर लगा कि ये लोग अपने काम को कितनी गंभीरता से लेते हैं। चबाकर थूक दिये जाने वाले पान की सज्जा देखकर हैरान हुआ। अंठावन साल से ये दुकान चल रही है। पूछा कि टेंशन फ्री पान क्या है। जवाब मिला कि मुंह में छाले पड़ जाएं तो टेंशन फ्री खाने से आराम होता है। हर पान खास लेबल के साथ पैक किया हुआ था। सादा पान खरीदा। पंद्रह रुपये का एक। रैपर हटाया तो चांदी का खूबसूरत वर्क दिखा। पान बहुत अच्छा था। तभी प्रिंस पान का यह नारा अद्भुत है- हम क्वालिटी बेचते हैं। लोग तेल बेच रहे हैं और ये क्वालिटी बेच रहे हैं। कम बड़ी बात नहीं है।

गायत्री परिवार और हमारी सोसायटी




लोग धर्मविमुख हो रहे हैं। ऐसा तो नहीं है लेकिन धर्म की शाखायें अपना स्टॉल लगा रही हैं। हमारी सोसायटी में आज हरिद्वार के गायत्री परिवार का स्टॉल लगा हुआ था। पंद्रह नवंबर को गायत्री महायज्ञ होगा। लगता है ये हाउसिंग सोसायटी में नया चलन है। किसकी अनुमति से यज्ञ हो रहा है पता नहीं लेकिन स्टॉल देखकर चौंक गया। लगा कि अब संस्था के लोग इन सोसायटियों को गंभीरता से लेने लगे हैं। भीतर आने के लिए सोसायटी के प्रेसिडेंट से बातचीत भी चलती होगी। मैं इसे सिर्फ एक बदलाव के रूप में देख रहा हूं। गायत्री परिवार की अपनी भूमिका रही है। लेकिन बदलते ज़माने के साथ धर्म कितनी तेजी से बदल रहा है। पंडित श्रीराम शर्मा की मोटी मोटी किताबें अब लघुतम पुस्तिकाओं में आने लगी हैं। मुफ्ता बांटी जा रही थीं। उम्मीद करता हूं कि आने वाले दिनों में सोसायटी में आशाराम बापू से लेकर कृपालु महाराज तक अपने स्टॉल लगायेंगे। धार्मिक संस्कारों को सोसायटीन्मुखी बनायेंगे। वाह रे स्टॉलमयी आध्यात्म।

जनसत्ता एक दस्तावेज़ है, प्रभाष जोशी इतिहासकार

(पहले करता था तो कोई नहीं कहता था। अब वैसी ही भागमभाग करूं तो सब कहते हैं कि नहीं। और अन्दर से भी आवाज़ आने लगती है कि रुको। पर मैं न बाहर की सुनता हूं न अन्दर की। फिर भी इस बार ज़रा ज़्यादती हो गई। पिछले रविवार को लखनऊ, दोपहर कानपुर, रात फिर लखनऊ, सुबह दिल्ली और शाम इन्दौर और दूसरे दिन वापस दिल्ली।)


प्रभाष जोशी ने यह बात ६ जनवरी १९९४ को कागद कारे में लिखी थी। अपने पागलपन के अर्थ को समझाने के लिए। बताने के लिए कि इनती व्यस्तता के बाद भी क्रिकेट के लिए जगह बचती है। पांच नंवबर २००९ को दुनिया छोड़ कर जाने से पहले वे दुनिया का चक्कर लगा आए। पटना, वाराणसी, लखनऊ, दिल्ली और फिर मणिपुर की यात्रा पर निकलने वाले थे कि शरीर ने इस बार ना कह दिया। क्रिकेट के तनाव और रोमांच ने उनकी धुकधुकी इतनी तेज़ कर दी होगी कि वो अपनी थकान और हार की हताशा को संभाल नहीं पाए। हम सब एनडीटीवी इंडिया के न्यूज़ रूम में बात कर रहे थे कि अगली सुबह प्रभाष जी सचिन के सत्रह हज़ार पूरे होने पर क्या लिखेंगे। कुछ आंसू होंगे, कुछ हंसी होगी और कुछ पागलपन। नए नए शब्द निकलेंगे और इस बार लिखेंगे तो उनकी कलम दो हज़ार शब्दों की सीमा को तोड़ चार हज़ार शब्दों तक जाएगी। शुक्रवार का जनसत्ता देख लीजिए। उसमें प्रभाष जी का नाम तक नहीं है। जिस अख़बार को बनाया वो भी उनकी मौत की ख़बर आने से पहले छप गया। तेंदुलकर की एक तस्वीर के साथ ६ नवंबर का जनसत्ता घर आ गया। उसने भी प्रभाष जी का इंतज़ार नहीं किया। इस बार प्रभाष जोशी ने अपने अख़बार की डेडलाइन की कम और अपने डेडलाइन की परवाह ज़्यादा की।


धोती-कुर्ता पहनकर हाथ से लिखने और दिल से बोलने वाले वे आखिरी गांधीवादी और गंवई पत्रकार संपादक हैं। दरअसल यही हिंदी पत्रकारिता का खालीपन है कि जिसने भी प्रभाष जोशी को उनके जाने के बाद याद किया, कई बार आखिरी शब्द का इस्तमाल किया। साफ है कि किसी ने प्रभाष जोशी बनने की कोशिश नहीं की। आज हिंदी के पत्रकार समृद्धि के मुकाबले में सबके बराबर हैं लेकिन पत्रकारिता कभी इतनी कमज़ोर नहीं रही। हिंदी के पत्रकार कभी इतने बेजान नहीं लगे। पेशेवर संस्कार इस तरह खत्म हो जाएंगे कि हर ओहदेदार पत्रकार यह कहता मिलेगा कि प्रभाष जोशी आखिरी संपादक थे। दरअसल प्रभाष जोशी की विरासत से छुटकारा पाना हो तो हर विश्लेषण में आखिरी लगा दीजिए। साफ है पत्रकार प्रभाष जोशी से प्रभावित तो होते रहे लेकिन प्रेरित नहीं हुए। बात साफ है उनके जैसा होने में असीम मेहनत और त्याग चाहिए। ये दोनों काम अब हिंदी के पत्रकारों के बस की बात नहीं। कुछ अपवादों की बात का यहां कोई मतलब नहीं है। हिंदी का हर पत्रकार कम मेहनत और कर्णप्रिय परंतु प्रभावशाली विचारों के सहारे खुद को पार लगा रहा है। चिंता करना उसकी आदत है और कोशिश करने का काम प्रभाष जोशी जैसे बुज़ुर्गों के हवाले कर देना है।


हिंदी पत्रकारिता के इस शमन-पतन काल में बची हुई चिंगारी का चला जाना भयानक सर्दी में बदन के ऊपर से गरम कंबल का हट जाना है। टीवी पर बंदरों की तरह लपकते-उचकते और अखबारों में कमज़ोर ख़बरों को अनुप्रासों से चमकाने के इस दौर में हिंदी पत्रकारिता समन्वयी हो गई है। प्रभाष जोशी बहत्तर साल की उम्र में इस समन्वय को तोड़ने के लिए घूम रहे थे। हिंदी के अख़बारों के नेताओं से पैसे लेकर ख़बरें छापने की करतूत के ख़िलाफ लिखने लगे। उन संपादकों और पत्रकारों से लोहा लेने लगे जो ख़बरों को छोड़ रहे थे और वक्त को परिभाषित कर रहे थे। टाइम चेंज कर गया है, हमारे समय के इस सबसे बड़े मिथक से लोहा लेने का काम प्रभाष जोशी ने ही किया। वो पागलों की तरह घूमने लगे। पटना, वाराणसी,इंदौर,भीलवाड़ा। कार से घूमते कि कम से कम देश दिख जाए। कुछ लिखा जाए। ड्राइंग रूम में बैठ कर कुछ भी नहीं लिखा। जब भी लिखा कहीं से घूम-फिर कर आने के बाद लिखा।


उनकी कमी इसलिए भी खलेगी कि उनके बाद के बचे हुए लोगों ने खुद को खाली घोषित कर दिया है। लेकिन प्रभाष जी इस कमी का रोना कभी नहीं रोए। बम-बम होकर जीया. बम-बम होकर घूमा और बम-बम होकर लिखा। नर्मदा को मां कहा और गंगा से कह दिया कि तुमसे वैसे रिश्ता नहीं बन पा रहा जैसा मां नर्मदा और मौसी क्षिप्रा से है। मालवा के संस्कारों को हिंदी के बीच ऐसे मिला दिया कि लोग फर्क ही नहीं कर पाये कि ये मट्ठा है या लस्सी।

जनसत्ता अख़बार में जाना होता था तो एक नज़र प्रभाष जोशी को खोजती थी। कालेज से निकले थे तो धोती-कुर्ते वाला संपादक अभिभावक की तरह लगता था। हिम्मत नहीं हुई उनके पास फटक जायें। बाद में पता चला कि उनके पास तो कोई भी आ-जा सकता है। गांव बुला लीजिए गांव चले जायेंगे और उनके साथ जन्मदिन मना लीजिए तो केक काटने आ जायेंगे। उनकी इसी भलमनसाहत ने उन्हें आम आदमी का संपादक बना दिया। वो विज़िटिंग कार्ड वाले संपादक नहीं हैं। मुझसे चूक हो गई। एनडीटीवी के दफ्तर में आते जाते वक्त दूर से नमस्कार और उनका यह कह कर जाना कि अच्छा काम करते रहो। लगता था कि बहुत मिल गया। एक बार निर्माण विहार के घर में गया। क्रिकेट पर स्पेशल रिपोर्ट बना रहा था। दीवार पर बगल में अपनी तान में खोए कुमार गंधर्व की तस्वीर और सर के ऊपर चरखा कात रहे गांधी की तस्वीर। समझ में आ गया कि ये आज कल वाले सुपर स्टार झटका टाइप पत्रकार नहीं हैं। ऐसा कैसे हो रहा है कि जिस शख्स से सिर्फ एक बार मुलाकात हुई उसके बारे में लिखने के लिए इतनी बातें निकलती जा रही हैं। कागद कारे को पढ़ने के बाद मन ही मन उनसे बात मुलाकात होते रहती थी। सहमति-असहमति चलती रहती थी।


क्रिकेट की सामाजिकता को मेरी नज़रों के सामने से ऐसे घुमा दिया कि मैं सोच में पड़ गया। आज कल हिंदी में क्रिकेट के विशेषज्ञ पत्रकार हैं। लेकिन वो स्कोर बोर्ड के जोड़-तोड़ से आगे नहीं जा पाए। उनके लिए क्रिकेट पत्रकारिता क्रिक इंफो से रिकार्ड ढूंढने जैसा है। काश मैं पूछ पाता कि प्रभाष जी आप जब लिखते हैं कि क्रिक इंफो से रिकार्ड चेक करते हैं। क्रिक इंफो ने पत्रकारों का काम आसान कर दिया। उसके बेहतर रिकार्ड संयोजन से काफी मदद मिलती है लेकिन क्या पत्रकारों ने इसका फायदा क्रिकेट के दूसरे हिस्सों को समझने के लिए उठाया। शायद नहीं। अगर प्रभाष जी क्रिकेट की रिपोर्टिंग के आदर्श रहे तो बाकी खेल पत्रकारों ने उसे आगे बढ़ाकर समृद्ध क्यों नहीं किया।

जनसत्ता एक दस्तावेज़ है। प्रभाष जोशी उसके इतिहासकार हैं। जो लिखा दिल और दिमाग से लिखा। तमाम भावनात्मक उतार-चढ़ाव के बीच भी विवेक की रेखा साफ नज़र आती थी। उनके आलोचक भी हैं। होने भी चाहिए। जिस व्यक्ति ने सब कुछ लिख दिया हो, उसके आलोचक नहीं होंगे तो किसके होंगे। वो अपने सही और ग़लत को हमारे बीच लिखित रूप में छोड़ गए हैं। जिसे जो उठाना है, उठा ले।


हिंदी पत्रकारिता में प्रतिभा की आज भी कमी नहीं है। उन प्रतिभाओं में भरोसे और प्रयोग की भयंकर कमी ने खालीपन को और बढ़ा दिया है। प्रभाष जोशी ने अपना भरोसा खुद ढूंढा। उन नौजवान पत्रकारों के बीच जाकर उसे और बढ़ाया जो उन्हें सुनने के लिए तैयार थे। उनके लिए वक्त निकाला। दरअसल यही मुश्किल है प्रभाष जोशी को याद करने में। कब आप उनके बारे में बात करते करते पत्रकारिता की बात करने लगते हैं और कब पत्रकारिता की बात करते करते प्रभाष जोशी की बात करने लगते हैं पता नहीं चलता। दोनों को अलग कर लिखा ही नहीं जा सकता। उनका खुद का इतना लिखा हुआ है कि उनके बारे में आप जितना लिखेंगे, कुछ न कुछ छूट ही जाएगा। शायद इसलिए भी कि वो हम सबके लिए बहुत कुछ छोड़ गए हैं।

शुक्रवार की सुबह एम्स में उनके लिए ताबूत आया तो उस पर लिखा था- मॉर्टल रिमेन्स ऑफ प्रभाष जोशी। जो छोड़ गए वो तो हिंदी पत्रकारिता की परंपरा का है, बाकी बचा तो बस प्रभाष जोशी का नश्वर शरीर। वो भी राख में बदल कर नर्मदा मां की अविरल धारा की गोद में खेलने चला गया।
( आज के जनसत्ता में भी छपा है)